मार्गदर्शिकाएँ · शांति · रिश्ते

भगवद्गीता 12.15

शांति दोनों ओर से होती है: दूसरों को परेशान न करना, और उनसे आसानी से परेशान न होना।

भगवद्गीता · अध्याय 12, श्लोक 15

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥

yasmān nodvijate loko lokān nodvijate ca yaḥ
harṣāmarṣa-bhayodvegair mukto yaḥ sa ca me priyaḥ

हिन्दी भावार्थ

जिससे संसार को उद्वेग नहीं होता और जो स्वयं संसार से उद्विग्न नहीं होता, जो हर्ष, अमर्ष (असहिष्णुता), भय और उद्वेग से मुक्त है — वह मुझे प्रिय है।

अंग्रेज़ी अनुवाद · English translation

One by whom the world is not disturbed, and who is not disturbed by the world; who is free from excitement, impatience, fear and agitation — that one is dear to me.

सरल शब्दों में व्याख्या

शांति दोनों ओर से होती है: दूसरों को परेशान न करना, और उनसे आसानी से परेशान न होना।

संदर्भ

उन गुणों के वर्णन का हिस्सा जो श्रीकृष्ण को किसी व्यक्ति में प्रिय हैं।

यह कब मदद कर सकता है

जब आप दूसरों से जल्दी चिढ़ जाते हों, या चिंता हो कि आप आसपास के लोगों को परेशान करते हैं।

चिंतन प्रश्न

इस हफ़्ते आप किसी एक रिश्ते में थोड़ी और शांति कैसे ला सकते हैं?

एक छोटा अभ्यास

आज किसी एक बातचीत में सामान्य से थोड़ा धीरे और नरमी से बोलिए।

इस श्लोक पर चिंतन कीजिए, अपने विचार सहेजिए या इसे कार्ड के रूप में साझा कीजिए।

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