मार्गदर्शिकाएँ · शांति · रिश्ते · अनासक्ति
भगवद्गीता 12.18
भीतर का संतुलन यानी लोगों के व्यवहार को अपनी शांति तय न करने देना।
भगवद्गीता · अध्याय 12, श्लोक 18
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥
samaḥ śatrau ca mitre ca tathā mānāpamānayoḥ
śītoṣṇa-sukha-duḥkheṣu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ
हिन्दी भावार्थ
जो शत्रु और मित्र में, मान और अपमान में, सर्दी-गर्मी और सुख-दुख में समान रहता है और आसक्ति से रहित है —
अंग्रेज़ी अनुवाद · English translation
One who is the same toward friend and foe, in honour and dishonour, in cold and heat, in pleasure and pain, and who is free from attachment —
सरल शब्दों में व्याख्या
भीतर का संतुलन यानी लोगों के व्यवहार को अपनी शांति तय न करने देना।
संदर्भ
श्रीकृष्ण उस स्थिर, प्रेमपूर्ण व्यक्ति का वर्णन जारी रखते हैं जो उन्हें प्रिय है।
यह कब मदद कर सकता है
जब किसी के व्यवहार ने आपका संतुलन हिला दिया हो।
चिंतन प्रश्न
आज आपकी शांति कितनी इस पर निर्भर रही कि दूसरों ने आपसे कैसा व्यवहार किया?
एक छोटा अभ्यास
आज किसी कठोर पल का जवाब शांत, सहज भाव से दीजिए — या बस मौन से।
इस श्लोक पर चिंतन कीजिए, अपने विचार सहेजिए या इसे कार्ड के रूप में साझा कीजिए।
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