मार्गदर्शिकाएँ · शांति · डर · विकास
भगवद्गीता 2.56
स्थिरता संभव है — कभी कुछ महसूस न करके नहीं, बल्कि हर भावना के वश में न होकर।
भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 56
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
duḥkheṣv anudvigna-manāḥ sukheṣu vigata-spṛhaḥ
vīta-rāga-bhaya-krodhaḥ sthita-dhīr munir ucyate
हिन्दी भावार्थ
जो दुख में विचलित नहीं होता, सुख की लालसा नहीं रखता, और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त है — वही स्थिर बुद्धि वाला मुनि कहलाता है।
अंग्रेज़ी अनुवाद · English translation
One whose mind is not shaken in sorrow, who does not crave pleasure, and who is free from attachment, fear and anger — such a person is called a sage of steady wisdom.
सरल शब्दों में व्याख्या
स्थिरता संभव है — कभी कुछ महसूस न करके नहीं, बल्कि हर भावना के वश में न होकर।
संदर्भ
अर्जुन पूछते हैं कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कैसा होता है। यह श्रीकृष्ण के उत्तर का हिस्सा है — एक चित्र जिसकी ओर बढ़ा जाए, न कि स्वयं को आँकने का पैमाना।
यह कब मदद कर सकता है
जब डर, क्रोध या चाह आपको इधर-उधर खींचें, और आप शांति की एक तस्वीर चाहें।
चिंतन प्रश्न
इस हफ़्ते किस भावना ने आपको सबसे ज़्यादा अपनी ओर खींचा?
एक छोटा अभ्यास
आज जब कोई तीव्र भावना उठे, मन में उसे नाम दीजिए: "यह डर है" या "यह क्रोध है।" नाम देने से थोड़ी जगह बनती है।
इस श्लोक पर चिंतन कीजिए, अपने विचार सहेजिए या इसे कार्ड के रूप में साझा कीजिए।
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