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भगवद्गीता 4.36

कोई भी भूल आपको समझ और नई शुरुआत की पहुँच से बाहर नहीं करती।

भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 36

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥

api ced asi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpa-kṛt-tamaḥ
sarvaṁ jñāna-plavenaiva vṛjinaṁ santariṣyasi

हिन्दी भावार्थ

यदि तुम सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो, तब भी ज्ञान रूपी नौका द्वारा तुम सब पापों को पार कर जाओगे।

अंग्रेज़ी अनुवाद · English translation

Even if you were the greatest of all wrongdoers, you would cross over every wrong by the boat of knowledge alone.

सरल शब्दों में व्याख्या

कोई भी भूल आपको समझ और नई शुरुआत की पहुँच से बाहर नहीं करती।

संदर्भ

श्रीकृष्ण ज्ञान की बदल देने वाली शक्ति की बात करते हैं — कोई भी अतीत इतना भारी नहीं कि उसे पार न किया जा सके।

यह कब मदद कर सकता है

जब अपराध-बोध या पछतावा आपको लगे कि आप फिर से शुरू नहीं कर सकते।

चिंतन प्रश्न

जो पछतावा आप उठाए हुए हैं, वही उठाए किसी मित्र से आप क्या कहते?

एक छोटा अभ्यास

अपने बीते हुए स्वयं को क्षमा का एक वाक्य लिखिए। अभी पूरी तरह विश्वास करना ज़रूरी नहीं।

इस श्लोक पर चिंतन कीजिए, अपने विचार सहेजिए या इसे कार्ड के रूप में साझा कीजिए।

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