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भगवद्गीता 6.5

आप स्वयं के मित्र बन सकते हैं। आप स्वयं से जिस तरह बात करते हैं, वह आपको उठा भी सकता है और गिरा भी सकता है।

भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 5

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet
ātmaiva hy ātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ

हिन्दी भावार्थ

मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, स्वयं को गिरने नहीं देना चाहिए। क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।

अंग्रेज़ी अनुवाद · English translation

Lift yourself up by your own self; do not let yourself sink down. For the self alone is the friend of the self, and the self alone is its enemy.

सरल शब्दों में व्याख्या

आप स्वयं के मित्र बन सकते हैं। आप स्वयं से जिस तरह बात करते हैं, वह आपको उठा भी सकता है और गिरा भी सकता है।

संदर्भ

गीता की सबसे निजी शिक्षाओं में से एक: स्वयं के साथ आपका रिश्ता बाकी सब कुछ को आकार देता है।

यह कब मदद कर सकता है

जब आपकी भीतर की आवाज़ कठोर हो, या आपको लगे कि शक्ति भीतर से ही खोजनी होगी।

चिंतन प्रश्न

अगर आज आप स्वयं से वैसे बात करते जैसे एक अच्छा मित्र करता, तो क्या कहते?

एक छोटा अभ्यास

आज जब भी स्वयं से कठोर बात करते पकड़ें, उसके बाद एक दयालु वाक्य जोड़ दीजिए।

इस श्लोक पर चिंतन कीजिए, अपने विचार सहेजिए या इसे कार्ड के रूप में साझा कीजिए।

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