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भगवद्गीता 6.7

प्रशंसा और आलोचना दोनों गुज़र जाती हैं। आपकी शांति को किसी पर निर्भर होने की ज़रूरत नहीं।

भगवद्गीता · अध्याय 6, श्लोक 7

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥

jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ
śītoṣṇa-sukha-duḥkheṣu tathā mānāpamānayoḥ

हिन्दी भावार्थ

जिसने स्वयं को जीत लिया है और जो प्रशांत है, उसकी आत्मा सर्दी-गर्मी, सुख-दुख और मान-अपमान में भी स्थिर रहती है।

अंग्रेज़ी अनुवाद · English translation

For one who has mastered the self and is deeply calm, the higher self remains steady — in cold and heat, pleasure and pain, honour and dishonour.

सरल शब्दों में व्याख्या

प्रशंसा और आलोचना दोनों गुज़र जाती हैं। आपकी शांति को किसी पर निर्भर होने की ज़रूरत नहीं।

संदर्भ

श्रीकृष्ण उस व्यक्ति की भीतरी शांति का वर्णन करते हैं जो दूसरों की नज़र से डगमगाता नहीं।

यह कब मदद कर सकता है

जब आलोचना चुभी हो, या आप दूसरों की स्वीकृति पर बहुत ज़्यादा निर्भर हों।

चिंतन प्रश्न

आप अभी किसकी स्वीकृति का इंतज़ार कर रहे हैं?

एक छोटा अभ्यास

आज जब प्रशंसा या आलोचना मिले, मन में बस "धन्यवाद" कहिए और उसे गुज़र जाने दीजिए।

इस श्लोक पर चिंतन कीजिए, अपने विचार सहेजिए या इसे कार्ड के रूप में साझा कीजिए।

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