मार्गदर्शिकाएँ · शांति · कठिन समय · विकास

भगवद्गीता 2.14

आप अभी जो महसूस कर रहे हैं वह सच है — और वह गुज़र भी जाएगा। मौसम की तरह, यह भी बदलेगा।

भगवद्गीता · अध्याय 2, श्लोक 14

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥

mātrā-sparśās tu kaunteya śītoṣṇa-sukha-duḥkha-dāḥ
āgamāpāyino 'nityās tāṁs titikṣasva bhārata

हिन्दी भावार्थ

हे कौन्तेय, इंद्रियों और विषयों के संपर्क से सर्दी-गर्मी और सुख-दुख आते हैं। ये आते-जाते रहते हैं, स्थायी नहीं हैं। हे भारत, इन्हें धैर्य से सहन करो।

अंग्रेज़ी अनुवाद · English translation

Contact with the world brings cold and heat, pleasure and pain. These come and go; they are not permanent. Learn to bear them patiently, Arjuna.

सरल शब्दों में व्याख्या

आप अभी जो महसूस कर रहे हैं वह सच है — और वह गुज़र भी जाएगा। मौसम की तरह, यह भी बदलेगा।

संदर्भ

श्रीकृष्ण अर्जुन को एक सरल बात से सँभालना शुरू करते हैं: हर अनुभूति और हर मनोदशा का एक आरंभ और एक अंत होता है।

यह कब मदद कर सकता है

जब कोई भावना हमेशा के लिए लगने लगे, या कोई कठिन दौर ख़त्म होता न दिखे।

चिंतन प्रश्न

ऐसी कौन-सी भावना है जिसे आपने पहले उठाया था और जो अंततः गुज़र गई?

एक छोटा अभ्यास

एक मिनट बैठिए और शरीर की किसी एक अनुभूति पर ध्यान दीजिए — गर्माहट, ठंडक, खिंचाव। देखिए वह अपने आप कैसे बदलती है।

इस श्लोक पर चिंतन कीजिए, अपने विचार सहेजिए या इसे कार्ड के रूप में साझा कीजिए।

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